CJP प्रदर्शन हिंसा मामला: सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में किया स्पष्ट, गंभीर अपराध के आरोपितों को नहीं मिलेगी राहत
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि 28 जुलाई के आदेश का उद्देश्य छोटे या राजनीतिक कारणों से दर्ज मामलों को लेकर भ्रम दूर करना था। अदालत ने कहा कि दिल्ली सहित सभी राज्य सरकारें अपने अधिकार क्षेत्र में दर्ज एफआईआर की समीक्षा कर उन्हें वापस लेने या बंद करने के लिए स्वतंत्र हैं। हालांकि, यह छूट गंभीर आपराधिक मामलों में लागू नहीं होगी।

नई दिल्ली: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के 20 जुलाई के संसद मार्च के दौरान हुई हिंसा और उसके बाद दर्ज एफआईआर से जुड़े मामलों पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अपने पूर्व आदेश को स्पष्ट करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि राहत केवल उन प्रदर्शनकारियों तक सीमित होगी, जिन पर गंभीर और जघन्य अपराधों के आरोप नहीं हैं। हत्या, दुष्कर्म, पॉक्सो जैसे गंभीर मामलों में आरोपित लोगों को किसी प्रकार की राहत नहीं मिलेगी। मामले की अगली सुनवाई अब 19 अगस्त को होगी।
राज्यों को एफआईआर वापस लेने की स्वतंत्रता
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि 28 जुलाई के आदेश का उद्देश्य छोटे या राजनीतिक कारणों से दर्ज मामलों को लेकर भ्रम दूर करना था। अदालत ने कहा कि दिल्ली सहित सभी राज्य सरकारें अपने अधिकार क्षेत्र में दर्ज एफआईआर की समीक्षा कर उन्हें वापस लेने या बंद करने के लिए स्वतंत्र हैं। हालांकि, यह छूट गंभीर आपराधिक मामलों में लागू नहीं होगी।
'आपराधिक इतिहास' का मतलब केवल गंभीर अपराध
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके पहले के आदेश में प्रयुक्त "आपराधिक इतिहास" शब्द का अर्थ केवल गंभीर और जघन्य अपराधों से है। यानी जिन लोगों पर हत्या, दुष्कर्म, पॉक्सो या अन्य संगीन अपराधों के आरोप हैं, उन्हें किसी प्रकार की राहत नहीं दी जाएगी। वहीं सामान्य या कम गंभीर आरोपों वाले प्रदर्शनकारियों के मामलों पर राज्य सरकारें अपने विवेक से निर्णय ले सकती हैं।
केंद्र सरकार ने दोहराया अपना रुख
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि सरकार प्रदर्शनकारियों से जुड़े मामलों में पहले दिए गए अपने आश्वासन पर कायम है। उन्होंने कहा कि 2,700 से अधिक ऐसे लोगों की पहचान की गई है, जिनके खिलाफ पहले से हत्या, दुष्कर्म, पॉक्सो जैसे गंभीर मामलों के रिकॉर्ड मौजूद हैं। ऐसे व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस नहीं ली जाएंगी।
पुलिस कार्रवाई पर उठे सवाल
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल और अभिषेक मनु सिंघवी ने पुलिस कार्रवाई को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए। गोपाल ने दावा किया कि प्रदर्शन के दौरान कुछ पुलिसकर्मी बिना वर्दी के मौजूद थे और बल प्रयोग में अनियमितताएं हुईं। उन्होंने अदालत से मांग की कि पुलिस आयुक्त और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के महानिदेशक से यह पूछा जाए कि लाठीचार्ज और पैलेट गन के इस्तेमाल की अनुमति किस आधार पर दी गई। सिंघवी ने भी कहा कि मामले के विभिन्न पहलुओं पर विस्तृत जवाब मांगा जाना चाहिए ताकि पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष समीक्षा हो सके।
पैलेट गन और निगरानी तकनीक पर भी सुनवाई
वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन के इस्तेमाल पर सवाल उठाते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर के बाद दिल्ली में भी इस प्रकार के हथियार के इस्तेमाल पर जवाब मांगा जाना चाहिए। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने केंद्र सरकार को हलफनामे में पैलेट गन के उपयोग को लेकर स्पष्ट जानकारी देने का निर्देश दिया। वहीं अधिवक्ता हरिहरन ने प्रदर्शन स्थल पर कथित फेसियल सर्विलांस और आधार आधारित पहचान प्रणाली के इस्तेमाल पर चिंता जताई। उनका कहना था कि बिना सहमति के चेहरे की पहचान तकनीक का इस्तेमाल निजता के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है। अदालत ने इस मुद्दे को भी रिकॉर्ड पर लिया।
राज्यों से भी मांगा गया जवाब
सुनवाई के दौरान विभिन्न राज्यों के मुख्य सचिव वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत में उपस्थित हुए। सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को निर्देश दिया कि वे हलफनामा दाखिल कर बताएं कि प्रदर्शन से जुड़े मामलों में अब तक क्या कार्रवाई की गई है और कितनी एफआईआर वापस लेने या बंद करने की प्रक्रिया शुरू की गई है।
19 अगस्त को होगी अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगली सुनवाई में विशेष जांच दल (SIT) गठित करने की मांग, पैलेट गन के इस्तेमाल पर केंद्र के जवाब और राज्यों द्वारा एफआईआर वापस लेने की स्थिति की समीक्षा की जाएगी। अदालत ने संकेत दिया कि सभी पक्षों के जवाब मिलने के बाद मामले में आगे की दिशा तय की जाएगी। CJP प्रदर्शन से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट का यह स्पष्टीकरण उन प्रदर्शनकारियों और राज्य सरकारों दोनों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे यह साफ हो गया है कि सामान्य प्रदर्शनकारियों और गंभीर आपराधिक मामलों में आरोपित व्यक्तियों के साथ अलग-अलग कानूनी दृष्टिकोण अपनाया जाएगा।


