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गुलामी की जंजीरों से निकला आइसक्रीम को स्वाद देने वाला वनीला

आज जिसे हम साधारण स्वाद समझते हैं, कभी वह वनीला राजाओं की पसंद था. मेसोअमेरिका के शासकों से लेकर यूरोप के आलीशान दरबारों तक इसकी मांग थी. दुनिया भर में इसकी खुशबू फैलाने का श्रेय एक 12 साल के गुलाम लड़के को जाता है

गुलामी की जंजीरों से निकला आइसक्रीम को स्वाद देने वाला वनीला
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आज जिसे हम साधारण स्वाद समझते हैं, कभी वह वनीला राजाओं की पसंद था. मेसोअमेरिका के शासकों से लेकर यूरोप के आलीशान दरबारों तक इसकी मांग थी. दुनिया भर में इसकी खुशबू फैलाने का श्रेय एक 12 साल के गुलाम लड़के को जाता है.

आज आइसक्रीम से लेकर खांसी की दवाओं तक में वनीला हर जगह मौजूद है. सिंथेटिक वैनिलिन के आने के बाद से यह स्वाद दुनिया के कोने-कोने तक पहुंच गया है. अब वनीला इतना आम हो चुका है कि अंग्रेजी भाषा में इसे सादे के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा है.

असल वनीला दुनिया की सबसे मुश्किल फसलों में से एक है. रासायनिक रूप से भी इसे बनाना काफी जटिल है. इसमें 200 से भी ज्यादा तरह के खुशबूदार कम्पाउंड्स होते हैं, जो इसकी अनोखी खुशबू और स्वाद का राज हैं. केसर के बाद वनीला दुनिया का दूसरा सबसे महंगा मसाला माना जाता है. इसकी कीमत लगभग 100 से 600 डॉलर प्रति किलोग्राम तक हो सकती है.

वनीला की इस कहानी में एक बिना डंक वाली मधुमक्खी, औपनिवेशिक सत्ता और एक 12 वर्षीय गुलाम बनाए गए लड़के एडमंड अल्बियस की अहम भूमिका है. जिसकी खोज ने वनीला की खेती का तरीका बदल दिया. अगर यह खोज नहीं हुई तो आज दुनिया इस स्वाद से अनजान होती.

सालों के कब्जे से पनपा वनीला का बीज

वनीला की कहानी शुरू होती है, प्राचीन मेसोअमेरिका से. वहां के गर्म और नम जंगलों में ‘वनीला प्लैनिफोलिया' नाम की एक खास जंगली ऑर्किड बेल उग आती है.

इतिहास के पन्नों में दर्ज लेखों से पता चलता है कि उस समय अलग-अलग समुदायों ने वनीला के लिए अपने-अपने नाम रखे थे. मेक्सिको के लोग इसे ‘त्लिलशाचितल', टोटोनाक लोग ‘शानात' और माया लोग ‘सिस्बिक' कहते थे. हालांकि, सभी सभ्यताओं में वनीला काफी कीमती थी. दवा बनाने से लेकर, धार्मिक अनुष्ठानों तक कई जगह इसका इस्तेमाल किया जाता था.

टोटोनाक लोग, आज के मेक्सिको के वेराक्रूज इलाके में वनीला की खेती करने वाला पहला समुदाय था. इसकी खुशबू के लिए वे इसे बेहद पसंद करते थे. बाद में जब एजटेक लोगों ने टोटोनाक इलाके पर कब्जा किया, तो टैक्स के तौर पर वनीला वसूलने लगे. एजटेक वनीला का इस्तेमाल ‘शोकोलात्ल' नामक के काकाओ ड्रिंक में स्वाद और सुगंध जोड़ने के लिए करते थे. ये ड्रिंक केवल ऊंचे पदों पर बैठे लोगों और योद्धाओं के लिए थी.

साल 1519 में एजटेक के सम्राट, मोक्तेजुमा द्वितीय ने यह खास ड्रिंक स्पेनिश सैनिकों को परोसा. यह घटना तब की है, जब स्पेन सेंट्रल मेक्सिको में अपना औपनिवेशिक शासन स्थापित कर रहा था.

बाद में स्पेनिश लोग वनीला यूरोप लेकर आ गए. शुरुआत में यह मेक्सिको से लाए गए चॉकलेट ड्रिंक के रूप में स्पेन के शाही दरबार तक पहुंचा. फिर धीरे-धीरे वनीला फ्रांस और इंग्लैंड के राजदरबारों की रसोइयों तक पहुंच गया, जहां इसका इस्तेमाल कर खास मिठाइयां और पेस्ट्रियां बनाई जाने लगी.

एक मधुमक्खी ने यूरोप को किया दंग

इस जंगली ऑर्किड की बेल को फ्रांस और इंग्लैंड के बागानों में उगाने की बहुत कोशिश की गई. लेकिन हर बार सिर्फ निराशा ही हाथ आई, लाख कोशिशों के बावजूद उसके फूलों में फल नहीं लगे.

औपनिवेशिक शासकों ने वनीला की बेलों को अपने दूसरे उपनिवेशों जैसे भारत, जावा, फिलीपींस और फ्रांस के कब्जे वले रीयूनियन द्वीप में भी उगाने की कोशिश की. वहां बेलें तो अच्छी तरह बढ़ीं, फूल भी खिले, लेकिन उन पर वनीला की फलियां नहीं आईं. यह परेशानी लगभग 300 सालों तक ऐसी ही बनी रही.

साल 1836 में बेल्जियम के बागवानी विशेषज्ञ, चार्ल्स मोरेन ने पता लगाया कि वनीला के फूलों का प्राकृतिक परागण एक बिना डंक वाली मेलिपोना मधुमक्खी करती है, जो केवल मेक्सिको में ही पाई जाती है. मोरेन ने अपनी प्रयोगशाला में हाथ से वनीला का परागण करने में सफलता तो हासिल की, लेकिन यह तरीका काफी धीमा और खेती के लिहाज से कारगर नहीं था.

तभी रीयूनियन द्वीप पर रहने वाले 12 साल के गुलाम बनाए गए एक लड़के एडमंड अल्बियस ने इस समस्या का समाधान खोज निकाला.

अल्बियस और उसका आसान सा हल

साल 1841 में अल्बियस ने हाथ से वनीला के फूलों का पॉलिनेशन करने का तरीका खोज निकाला. एडमंड अल्बियस ने अपने अंगूठे और लकड़ी के एक छोटे-से टुकड़े की मदद से वनीला के फूल के भीतर मौजूद एक पतली झिल्ली को उठाया, जो नर प्रजनन भाग, पोलेन और मादा प्रजनन भाग, स्टिग्मा को अलग रखती है. फिर उसने दोनों को आपस में मिला दिया. इसके कुछ ही समय बाद ऑर्किड के फूलों पर वनीला की फलियां बनने लगीं.

इतिहासकार और ‘वनीला: द हिस्ट्री ऑफ ऐन एक्स्ट्राऑर्डिनरी बीन' (2025) के लेखक एरिक टी. जेनिंग्स ने खुद इस तकनीक को आजमाया है. उनके अनुसार, "कई महान आविष्कारों की तरह यह तरीका सुनने में बेहद आसान जरूर लग सकता है, लेकिन वनीला के फूलों के नर और मादा भागों को सही ढंग से मिलाना उतना आसान नहीं है, जितना दिखाई देता है.”

अल्बियस की खोज के बाद कुछ समय के लिए रीयूनियन द्वीप दुनिया का सबसे बड़ा वनीला उत्पादक बन गया था. लेकिन 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में फ्रांसीसी औपनिवेशिक प्रशासन ने हाथ से परागण की तकनीक अपने दूसरे उपनिवेश मेडागास्कर तक भी पहुंचा दी. आज मेडागास्कर दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक वनीला उत्पादक है. फ्रांसीसी उपनिवेशों में उगाई गई इस वनीला को ‘बॉर्बन वनीला' कहा जाने लगा. इसका नाम रीयूनियन द्वीप के पुराने औपनिवेशिक नाम ‘आइल बॉर्बन' पर रखा गया था.

वनीला का हीरो या कहानी का बस कोई किरादार?

अल्बियस की तकनीक आज भी पूरी दुनिया में वनीला की खेती के लिए इस्तेमाल की जाती है. वनीला का यह कारोबार आज अरबों डॉलर का उद्योग बन चुका है. यह बेहद मेहनत और सावधानी वाला काम है, क्योंकि वनीला का हर फूल केवल एक दिन के लिए ही खिलता है और उसी दौरान उसका हाथ से परागण करना पड़ता है.

इतनी बड़ी खोज के बावजूद अल्बियस को इससे कभी कोई आर्थिक लाभ नहीं मिला. 12 वर्ष की उम्र में विकसित की गई उनकी तकनीक से फ्रांसीसी औपनिवेशिक शासन ने भारी मुनाफा कमाया, लेकिन स्वयं अल्बियस का 1880 में गरीबी के चलते निधन हो गया.

जेनिंग्स ने अपने शोध के लिए रीयूनियन द्वीप का दौरा किया. वह बताते हैं कि अल्बियस की याद में उनके जन्मस्थान सैंट-सुजान में एक मूर्ति बनाई गई है. उनके नाम पर कुछ स्कूल भी हैं. फिर भी, जेनिंग्स के अनुसार, उनकी कहानी आज भी बहुत कम लोगों को पता है, जबकि उनकी खोज ने रीयूनियन द्वीप को पूरी तरह बदल दिया था.

जेनिंग्स के अनुसार, अल्बियस की खोज के 30 सालों के भीतर ही रीयूनियन दुनिया का सबसे बड़ा वनीला उत्पादक बन गया था. इतना ही नहीं, बल्कि इस खोज ने द्वीप की खेती को केवल गन्ने पर निर्भर रहने से बचाया. उस समय लगातार गन्ने की खेती से वहां की उपजाऊ मिट्टी भी कमजोर होती जा रही थी.

जेनिंग्स मानते हैं कि अल्बियस को उनकी खोज का उचित श्रेय और आर्थिक लाभ नहीं मिलने का एक बड़ा कारण यह भी था कि वह गुलाम थे. हालांकि, उन्हें इस तकनीक का असल आविष्कारक माना गया. जब रीयूनियन के प्रमुख वनस्पति उद्यान के एक श्वेत वनस्पतिशास्त्री ने इस खोज का श्रेय लेने की कोशिश की, तो वह सफल नहीं हो सका.

जेनिंग्स बताते हैं, "आज एडमंड अल्बियस के बारे में जो जानकारी हमारे पास है, वह इसलिए है क्योंकि उनके पूर्व मालिक और उन्हें जानने वाले लोगों ने उस झूठे दावे का विरोध किया और साबित किया कि इस तकनीक के असली आविष्कारक अल्बियस ही थे.”

सादी दिखने वाली हर चीज सादी नहीं होती

एडमंड अल्बियस की खोज के बाद भी वनीला की कहानी लगातार बदलती रही. 1858 में रसायनज्ञों ने वनीला की खुशबू के लिए जिम्मेदार मुख्य तत्व वैनिलिन को अलग किया और 1874 में इसे कृत्रिम रूप से बनाना मुमकिन हो गया.

सस्ता और बड़े पैमाने पर आसानी से बनाया जा सकने वाला सिंथेटिक वैनिलिन जल्द ही आइसक्रीम, कोल्ड ड्रिंक, परफ्यूम, बेकरी उत्पादों और पैकेज्ड फूड में इस्तेमाल होने लगा. इससे कभी बेहद कीमती माने जाने वाला वनीला एक आम स्वाद बन गया.

जेनिंग्स के अनुसार, कृत्रिम वैनिलिन के आने से वनीला के प्रति लोगों की धारणा बदल गई है. 1880 से 1960 के बीच सिंथेटिक वैनिलिन ने वनीला को अधिक लोगों तक पहुंचाया. लेकिन इसके साथ ही यह कुछ खास लगना भी बंद हो गया. उनके शब्दों में कहें तो, सिंथेटिक वैनिलिन की सपाट खुशबू ने वनीला के लिए ‘साधारण' या ‘फीकी' धारणा को बढ़ावा दिया. इसमें असली वनीला जैसी गहराई और विविधता महसूस नहीं होती.

जबकि असली वनीला की फली में 200 से भी ज्यादा तरह के प्राकृतिक कंपाउंड होते हैं, जिसका ना कभी स्वाद फीका था और ना ही इतिहास की कहानी.


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