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बदलाव की राजनीति का शंखनाद

जनता ने बदलाव की राजनीति का शंखनाद कर दिया है, यह वक्तव्य दतिया की जनता के लिए मध्यप्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने दिया है।

बदलाव की राजनीति का शंखनाद
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जनता ने बदलाव की राजनीति का शंखनाद कर दिया है, यह वक्तव्य दतिया की जनता के लिए मध्यप्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने दिया है। लेकिन देखा जाए तो यह देशव्यापी स्तर पर भी सटीक बैठ रहा है। मध्यप्रदेश, गुजरात और बिहार तीनों भाजपाशासित राज्यों में एक-एक विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुए, जिनमें भाजपा केवल गुजरात की सीट बचा पाई, जबकि मध्यप्रदेश और बिहार में उसे बड़ा झटका मिला है। इन सीटों की हार या जीत से मध्यप्रदेश, गुजरात या बिहार की मौजूदा सत्ता पर कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन ये नतीजे राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माने जा रहे हैं। भाजपा को तीनों सीटों पर अपनी जीत का इतना यकीन था कि उसने पहले से मिठाई बंटवाने का इंतजाम कर लिया था। बिहार की बांकीपुर सीट पर जीत का जश्न मनाने के लिए दो सौ किलो लड्डू बनाने का वीडियो सोशल मीडिया पर तैर रहा है। अब जीत के लिए बने इन लड्डुओं को विजेता बन कर उभरे प्रशांत किशोर के साथ क्या भाजपा साझा करेगी, ये उलझाने वाला सवाल बिहार में खड़ा हो चुका है।

दरअसल बांकीपुर पर हार या जीत को केवल जनादेश कहकर इसका विश्लेषण खत्म नहीं किया जा सकता, क्योंकि इस सीट पर ढेर सारे किंतु-परंतु चस्पां हैं। बांकीपुर भाजपा के लिए पार्टी के तौर पर तो प्रतिष्ठा का सवाल थी ही, क्योंकि बिहार में सम्राट चौधरी को भाजपा ने मुख्यमंत्री बनाया, पहली बार सत्ता पर सीधे भाजपा की पकड़ बनी। इसके लिए नीतीश कुमार से वादाखिलाफी करके उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने के लिए मजबूर किया गया और 20 सालों की उनकी सत्ता का हासिल आखिर में राज्यसभा सीट बना दिया गया। सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री रहते पहली बार उपचुनाव हुए और उसमें बड़ी हार मिली तो यह निश्चित तौर पर भाजपा के लिए झटका है, लेकिन उससे बड़ा झटका यह है कि बांकीपुर सीट नितिन नबीन के राज्यसभा में जाने के कारण खाली हुई थी। भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने के बाद नितिन नबीन को विधानसभा छोड़कर राज्यसभा में जाने कहा गया और अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठने के बावजूद उन्हें भाजपा के असली आकाओं का यह फरमान मानना पड़ा। नरेन्द्र मोदी ने नितिन नबीन को अध्यक्ष की कुर्सी पर बिठाकर फूल-मालाएं पहनाकर उन्हें अपना बॉस बताया था। लेकिन बॉस की सीट बचाने की कोई कोशिश न नरेन्द्र मोदी ने की, न अमित शाह ने की, तो यह संशय उपजता है कि आखिर इनकी पॉलिटिक्स क्या है। क्या जानबूझकर नितिन नबीन की पारंपरिक सीट को हारा गया है, क्योंकि बांकीपुर की सोशल इंजीनियरिंग भी भाजपा के ही फायदे की ही है। यहां सवर्ण मतदाताओं की संख्या अल्पसंख्यकों और पिछड़ों से ज्यादा है। जुलाई महीने में नितिन नबीन चार-चार बार बांकीपुर आए, ताकि प्रचार अच्छे से हो सके। लेकिन इससे पहले इस सीट पर नामांकन से ठीक पहले भाजपा के प्रत्याशी बने अभिषेक बंटी ने नाम वापस लिया और फिर उनकी जगह नीरज सिन्हा को उम्मीदवार बनाया गया। हालांकि प्रत्याशी के नाम से ज्यादा नितिन नबीन के नाम पर चुनाव लड़ा गया, क्योंकि पहले पांच बार नितिन नबीन और उससे पहले चार बार उनके पिता इस सीट से विधायक बनते रहे।

30 सालों तक बांकीपुर सीट भाजपा के पास रही और अब जनसुराज पार्टी के प्रशांत किशोर के पास चली गई है। चुनावी रणनीति बनाते-बनाते प्रशांत किशोर इस बिहार विधानसभा चुनाव से पहले जनसुराज पार्टी बनाकर खुद चुनावी राजनीति में आ गए थे। उन्होंने खुद किसी सीट पर चुनाव नहीं लड़ा था, लेकिन उनके प्रत्याशी जितनी सीटों पर खड़े हुए, सब जगह उन्हें हार मिली थी। मगर अब बिहार विधानसभा में एक विधायक जनसुराज पार्टी का भी रहेगा। देखना ये है कि प्रशांत किशोर भाजपा की आवाज मजबूत करते दिखेंगे या विपक्ष की। क्योंकि उन्होंने इस जीत के बाद कहा है कि 'यह विधायक बनाने का उपचुनाव नहीं है। बल्कि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को संदेश देने का चुनाव है कि बिहार में किसी अच्छे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाइए। किसी अपराधी या गलत चरित्र वाले नेता को मुख्यमंत्री मत बनाइए।Ó बांकीपुर के लोगों ने यह संदेश दे दिया है। प्रशांत किशोर ने कहा कि अब भाजपा के नेतृत्व की जिम्मेदारी है कि सम्राट चौधरी को हटाकर ऐसे नेता को मुख्यमंत्री बनाए, जो बिहार में रोजगार लाए, शिक्षा की स्थिति सुधारे, भ्रष्टाचार और पलायन को बंद कर सके। उन्होंने सम्राट चौधरी पर आरोप लगाते हुए कहा कि भाजपा ने ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाया हुआ है जिनका चरित्र आपराधिक है।

बहरहाल, प्रशांत किशोर की राजनीति का खुलासा भी जनता के सामने हो ही जाएगा। लेकिन भाजपा को सही मायने में हार मिली है मध्यप्रदेश में। यहां दतिया सीट भाजपा 2023 के चुनाव में भी हारी थी, तब कांग्रेस से राजेंद्र भारती जीते थे, मगर धोखाधड़ी के एक केस में 3 साल की सजा सुनाए जाने के चलते उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त हुई, तो उपचुनाव हुए। इस बार कांग्रेस ने घनश्याम सिंह को उम्मीदवार बनाया। यहां भी भाजपा को प्रत्याशी खड़ा करने में खासी मशक्कत करनी पड़ी। पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा तैयार बैठे थे कि वही इस बार भी लड़ेंगे। लेकिन भाजपा ने आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया, जिसके बाद पार्टी के भीतर का कलह पूरे देश ने देखा। मामला किसी तरह संभाल लिया गया, लेकिन अब उसका नतीजा सामने है कि कांग्रेस ने भाजपा को हरा दिया है। मध्यप्रदेश में 2018 में कांग्रेस की सरकार बनी थी, लेकिन बीच में ही ज्योतिरादित्य सिंधिया की बगावत और भाजपा में जाने के फैसले ने फिर से भाजपा को सत्ता में आने का मौका दिया। 2023 का चुनाव भी कांग्रेस हार गई। लेकिन मौजूदा अध्यक्ष जीतू पटवारी ने कांग्रेस में नयी जान फूंकने का काम किया है। उनके मैदान में लगातार डटे रहने का असर कार्यकर्ताओं पर भी पड़ा और अंदरूनी गुटबाजी के कारण पार्टी में जो निराशा भरी हुई थी, वो दूर हुई। अब इस जीत के बाद कांग्रेस थोड़ी और मजबूत होगी, ऐसी उम्मीद है। जीतू पटवारी ने दतिया की जनता का आभार तो व्यक्त किया ही है, जिस तरह उन्होंने अखिलेश यादव के सहयोग के लिए धन्यवाद दिया, उससे जाहिर होता है कि अब उत्तरप्रदेश चुनाव में भी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच अच्छा तालमेल देखने मिलेगा।

गुजरात की मांजलपुर सीट पूर्व मंत्री और विधायक योगेश पटेल के निधन से खाली हुई थी, यहां भाजपा के सतीश गोविंदभाई पटेल और गुजरात कांग्रेस के उपाध्यक्ष और पूर्व मंत्री भीखाभाई रबारी के बीच सीधा मुकाबला था, जिसमें कांग्रेस को हार मिली। गुजरात में अभी भाजपा की जमी हुई सत्ता को हटाने के लिए काफी मेहनत की जरूरत है, यह बात कांग्रेस भी जानती है।

बाकी इन तीनों सीटों के नतीजों में भाजपा को मिली मात के पीछे जेन ज़ी आंदोलन का हाथ भी माना जा रहा है, जो जाहिर भी है। जिस सरकार में इस्तीफे नहीं होते थे, वहां अब इस्तीफे हो रहे हैं, प्रधानमंत्री और गृहमंत्री सदन में नहीं आ रहे और राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट हाथ से चली गई। यह सब संयोग नहीं है।


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