महिला पहलवान यौन उत्पीड़न मामले में बृजभूषण शरण सिंह बरी, राउज एवेन्यू कोर्ट ने सुनाया फैसला
दिल्ली पुलिस ने जून 2023 में इस मामले में करीब 1,000 पन्नों की चार्जशीट अदालत में दाखिल की थी। पुलिस ने जांच के दौरान 108 लोगों के बयान दर्ज किए थे और आरोप लगाया था कि बृजभूषण शरण सिंह ने महिला पहलवानों के साथ कथित तौर पर अनुचित व्यवहार और यौन उत्पीड़न किया।

नई दिल्ली: महिला पहलवानों द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों से जुड़े चर्चित मामले में दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने पूर्व भाजपा सांसद और भारतीय कुश्ती महासंघ (डब्ल्यूएफआई) के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह को बरी कर दिया है। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (एसीजेएम) अश्विनी पंवार ने सोमवार को यह फैसला सुनाया। यह मामला वर्ष 2023 में महिला पहलवानों के विरोध-प्रदर्शन के बाद दर्ज किया गया था। लगभग तीन वर्ष तक चली न्यायिक प्रक्रिया और विस्तृत सुनवाई के बाद अदालत ने अपना निर्णय सुनाया।
2023 में दर्ज हुई थी चार्जशीट
दिल्ली पुलिस ने जून 2023 में इस मामले में करीब 1,000 पन्नों की चार्जशीट अदालत में दाखिल की थी। पुलिस ने जांच के दौरान 108 लोगों के बयान दर्ज किए थे और आरोप लगाया था कि बृजभूषण शरण सिंह ने महिला पहलवानों के साथ कथित तौर पर अनुचित व्यवहार और यौन उत्पीड़न किया। मामले में अदालत ने 2 जुलाई को दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। लगभग एक महीने बाद अदालत ने अपना निर्णय सुनाते हुए बृजभूषण शरण सिंह को आरोपों से बरी कर दिया।
बचाव पक्ष ने क्या दलील दी?
सुनवाई के दौरान बृजभूषण शरण सिंह की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं राजीव मोहन और ऋषभ भाटी ने पक्ष रखा। बचाव पक्ष ने अदालत में कई आधारों पर अभियोजन के आरोपों को चुनौती दी। वकीलों का तर्क था कि शिकायतकर्ताओं के बयानों में समय, स्थान और घटनाक्रम को लेकर अलग-अलग चरणों में असंगतियां सामने आईं, जिससे अभियोजन पक्ष के आरोपों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं। बचाव पक्ष ने यह भी दावा किया कि जिन घटनाओं में से एक कुश्ती महासंघ के कार्यालय से जुड़ी बताई गई थी, उस समय बृजभूषण शरण सिंह भारत में मौजूद ही नहीं थे। इस संबंध में अदालत के समक्ष दस्तावेजी साक्ष्य भी प्रस्तुत किए गए।
अदालत में साक्ष्यों पर हुई बहस
बचाव पक्ष का कहना था कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत अधिकांश साक्ष्य परिस्थितिजन्य और मौखिक प्रकृति के थे तथा आरोपों की पुष्टि करने वाला कोई प्रत्यक्ष भौतिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराया गया। साथ ही यह भी दलील दी गई कि अभियोजन जिन गवाहों पर निर्भर था, उनमें कोई भी कथित घटनाओं का प्रत्यक्षदर्शी नहीं था। ऐसे में आरोपों को संदेह से परे सिद्ध नहीं किया जा सका और आरोपी को कानून के अनुसार 'संदेह का लाभ' (Benefit of Doubt) मिलना चाहिए। अदालत ने अपने फैसले में किन कानूनी आधारों को स्वीकार किया, उसका विस्तृत आदेश उपलब्ध होने के बाद ही पूरी तस्वीर स्पष्ट होगी।
पॉक्सो मामला पहले ही हो चुका था बंद
इस पूरे प्रकरण की शुरुआत एक नाबालिग पहलवान की शिकायत से भी हुई थी, जिसके आधार पर बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ पॉक्सो अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया था। बाद में शिकायतकर्ता ने मजिस्ट्रेट के समक्ष अपना बयान बदलते हुए शिकायत वापस लेने की इच्छा जताई। इसके बाद अदालत ने संबंधित मामले को बंद कर दिया था। इस प्रकरण में दर्ज एक अन्य धमकी के मामले में भी बृजभूषण शरण सिंह को पहले राहत मिल चुकी थी।
फैसले के बाद बृजभूषण की प्रतिक्रिया
अदालत से राहत मिलने के बाद बृजभूषण शरण सिंह ने संक्षिप्त प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "होइए वही जो राम रचि राखा।" वहीं, इस फैसले पर विभिन्न पक्षों की प्रतिक्रियाएं सामने आने की संभावना है। अदालत के विस्तृत आदेश के अध्ययन के बाद कानूनी विशेषज्ञ भी इस मामले के विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण करेंगे। यह मामला पिछले तीन वर्षों से देशभर में चर्चा का विषय रहा है। अब अदालत के फैसले के साथ इस मुकदमे का एक महत्वपूर्ण चरण पूरा हो गया है, हालांकि यदि कोई पक्ष निर्णय को चुनौती देना चाहे तो कानून के तहत उच्च अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है।


