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इंसान को कीड़ा बनाकर उस पर राज करना आसान है

चुपमाएं वह होती हैं जो आदमी को बड़ा बनाएं। उदात्त। और खास तौर से जब वे ऊपर से आ रही हों। लेकिन आज तो तिरस्कार अपमान करने वाले शब्द ही कहे जा रहे हैं।

इंसान को कीड़ा बनाकर उस पर राज करना आसान है
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कहानी का सार यह है कि कीड़े में बदलने के बाद उसकी कोई उपयोगिता नहीं रहती। और आज भी यही कोशिश हो रही है कि व्यक्ति की सारी उपयोगिता खत्म कर दी जाए। नहीं तो आदमी को काक्रोच कहने का मतलब क्या है? शायद इतना ही कि कीड़े-मकोड़ों पर राज करना आसान है। इंसान कीड़े-मकोड़ों में बदल जाएं तो फिर राज शाश्वत है।

चुपमाएं वह होती हैं जो आदमी को बड़ा बनाएं। उदात्त। और खास तौर से जब वे ऊपर से आ रही हों। लेकिन आज तो तिरस्कार अपमान करने वाले शब्द ही कहे जा रहे हैं। इससे फर्क नहीं पड़ता कि युवा के लिए नहीं फलाने के लिए कहा था। शब्द ही इतना गंदा है कि सभ्य समाज में उपयोग ही नहीं होता। केवल कीटनाशक दवाईयां बनाने वालों के शब्दकोष में ही होता है।

इंसान को काक्रोच बना दिया। फिर कहा कि इस वाले इंसान को नहीं उस वाले को बनाया था। इससे पहले कभी सुना नहीं। हां बहुत ही गंदे किस्म के लोग प्रतिक्रियावादी इस तरह की उपमाएं देते थे। मगर चीफ जस्टिस आफ इंडिया सूर्यकांत ने जब पहले देश के बेरोजगार युवाओं के लिए और फिर भारी आलोचना होने पर कहा कि फर्जी डिग्री वालों के लिए कहा है तो सौ साल से ज्यादा पुरानी कहानी कायान्तरण याद आ गई। फ्रेंज काफ्का बहुत बड़े लेखक। उनका लिखा करीब-करीब पूरा हिन्दी में उपलब्ध है। उनकी लंबी कहानी है मेटामॉर्फेसिस। क्लासिक रचना मानी जाती है।

हिन्दी में कई नामों से अनुवाद हुआ है। कायान्तरण, कायाकल्प, रुपान्तरण। क्या जस्टिस सूर्यकांत उसे यथार्थ में उतारना चाहते हैं? पता नहीं उन्होंने पढ़ी है कि नहीं। पढ़ना-लिखना माहौल संगत से होता है। नेहरू के टाइम में देश में पढ़ने-लिखने का शौक था। खुद बड़े लेखक थे। और पढ़ते भी बहुत थे। रात को पढ़ते-पढ़ते सो जाने वाले। किताब सीने पर उलटी रखी हुई।

उस वक्त माएं कहती थीं पंडित जी तो प्रधानमंत्री हैं उनकी किताब तो कोई उठा देता होगा तुम्हारी उठाने के लिए तो मुझे रोज जागना पड़ता है। खैर, कहां पंडित जी याद आ गए! मगर क्या करें याद तो उनसे पहले के काफ्का भी आ गए। बड़े लोग याद आएं अच्छे संदर्भों में तो दिल खुश होता है। लेकिन कीड़े-मकोड़ों की बात पर बड़े लोगों का याद आना अच्छा नहीं लगता।

बहरहाल काफ्का बड़े लेखक थे। इसलिए लगता है कि शायद उन्हें पढ़ा होगा। वरना आजकल पढ़ना-लिखना भी गुनाह हो गया है। एक हाईकोर्ट के जज ने एक लेखक एक्टिविस्ट के घर पाई गई विदेशी लेखकों की किताबों पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि इन्हें भारत में पढ़ने की क्या जरूरत? अभी खुद चीफ जस्टिस ने ही अपनी जिस टिप्पणी में काक्रोच और परजीवी (पेरासाइट) कहा है वह एक्टिविस्टों पर भी है।

समाज में काम करने वाले लोग प्रधानमंत्री के निशाने पर तो पहले से थे। उन्हें वे अरबन नक्सल, खान मार्केट गेंग, टूलकिट और भैंस उठा कर ले जाएंगे पता नहीं किन-किन नाम से बदनाम करते थे।

मगर अब न्यायपालिका भी वही भाषा बोलने लगी तो तो समझ लीजिए यह देश का मेटामार्फासिस करने (कायान्तरण) की तैयारी कर रहे हैं। जैसे उस कहानी में बदल गया वैसे ही वास्तव में इंसान की कीड़े में बदलने की कोशिश। पहले बेरोजगार युवाओं के लिए कहा। भारत की न्याय व्यवस्था आजादी के बाद से नहीं या अंग्रेजों द्वारा कानून सिविल और क्रीमिनल बनाने से नहीं उससे पहले से न्याय का तसव्वुर पेश करती रही है।

सिंहासन बत्तीसी मतलब विक्रमादित्य का न्याय का सिंहासन या जहांगीर का इंसाफ की घंटा न्याय की पूरी परिकल्पना पेश करते हैं। वहां आज के न्याय के सिंहासन पर बैठे सर्वोच्च न्यायाधीश यह सवाल नहीं उठाते कि बेरोजगारी है क्यों? नौकरियां कहां गईं? सेना तक में ठेके पर लोग क्यों रखे? क्या देश का युवा देश का भविष्य नहीं होता? उसे रोजगार, नौकरी क्यों नहीं?

मगर चीफ जस्टिस ने यह सब नहीं पूछा। 22 लाख से ज्यादा स्टूडेंट एक झटके में निराशा और अनिश्चितता के गर्त में झूल गए। नीट की परीक्षा का पेपर लीक हो गया। चीफ जस्टिस ने नहीं पूछा कि कैसे हुआ? पहली बार नहीं हुआ। दो साल पहले 2024 में भी हो गया था। क्या सबक लिया? क्या कार्रवाई की?

2024 में परीक्षा लेने वाली एजेंसी के डायरेक्टर जनरल कौन थे? पेपर लीक होने के बाद उन्हें सज़ा मिली या ईनाम में अच्छी पोस्टिंग?

सुप्रीम कोर्ट को 22 लाख बच्चे उनके माता-पिता की तरफ से सरकार से यह नहीं पूछना चाहिए था? पांच बच्चों के आत्महत्या करने की खबर है। इनके प्रति सुप्रीम कोर्ट की कोई जिम्मेदारी नहीं! डर तो इस बात का है कि कहीं यह नहीं कह दें कि पेपर लीक हुआ परीक्षा रद्द हो गई तो क्या हुआ? अगले साल दे लेना! बंगाल में 27 लाख वोट काटने की बात माने कि जायज हैं। मगर कहा कि क्या हुआ अगली बार वोट दे लेना। काटे तो 91 लाख वोट थे। मगर 27 लाख के बारे में तो माना कि गलत काटे गए। फिर भी वोट नहीं देने दिया गया। नतीजा क्या हुआ फिर भी भाजपा को केवल 32 लाख वोट ही ज्यादा मिले। हारने वाली टीएमसी से।

अगर जिन्हें अधिकार था उन्हें वोट डालने दिया जाता तो क्या होता? 31 सीटें ऐसी हैं जहां जीत का अंतर उस सीट पर काटे गए वोटों से कम है। मतलब अगर जायज वोटों को डालने दिया जाता तो परिणाम में फर्क पड़ सकता था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था- इस बार नहीं डाल पा रहे तो क्या हुआ? अगली बार डाल लेना। अगली बार जैसे कल हो रहा हो। पांच साल बाद होगा। तब तक एक ऐसी सरकार काम करेगी जिसकी कानूनी वैधता संदिग्ध है।

तो सुप्रीम कोर्ट ने न बंगाल पर न नीट के पेपर लीक होने पर कुछ कहा न पूछा कि 2024 में जिस डीजी के कार्यकाल में पेपर लीक और परीक्षा रद्द हुई वह कहां हैं? और एक बात नीट की परीक्षा दो बार रद्द हुई है। मगर पेपर लीक चौथी बार हुआ है। यह भी बता दें कि जिन डीजी सुबोध कुमार सिंह को 2024 में पेपर लीक होने पर उस समय हटा दिया गया था अब सुबोध कुमार सिंह छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के प्रिंसिपल सेक्रेटरी हैं। मुख्यमंत्री का प्रिंसिपल सेक्रेटरी कितना ताकतवर होता है सब जानते हैं। पूरा प्रशासन वही चलाता है।

तो यह सब नजरअंदाज। युवा या बाद में जो कहा फर्जी डिग्रीधारी उनकी समस्या या बात सुने बिना सीधे उन्हें काक्रोच परजीवी की उपमा दे दी। युवाओं की बेरोजगारी पर कु छ नहीं बोला उनकी मदद मुश्किल लगी होगी मगर फर्जी डिग्रीधारियों की जांच के लिए तो कोई आदेश करना था। जैसे एसआईआर किया वैसे ही डिग्रियों की जांच भी कर सकते हैं। डिग्री वाले तो वोटरों से बहुत कम हैं।

लेकिन यह सब कुछ नहीं जनता के खिलाफ माहौल बनाना है। उसे ही हर चीज के लिए दोषी करार देना है। इसलिए वह पुरानी कहानी जो विश्व के साहित्यिक इतिहास में मानव जीवन की सबसे भयानक त्रासदी के तौर पर जानी जाती है मेटामॉर्फेसिस याद आ जाती है।

एक सामान्य काम करने वाला आदमी ग्रेगोर सैमसा एक दिन अचानक एक बड़े से कीड़े में तब्दील हो जाता है। वह तो कहानी थी। बहुत दुखद होता है उसके साथ मगर आज तो लगाता है कि वास्तव में आदमी को कीड़े-मकोड़े में बदलने की कोशिश हो रही है।

कहानी का सार यह है कि कीड़े में बदलने के बाद उसकी कोई उपयोगिता नहीं रहती। और आज भी यही कोशिश हो रही है कि व्यक्ति की सारी उपयोगिता खत्म कर दी जाए। नहीं तो आदमी को काक्रोच कहने का मतलब क्या है? शायद इतना ही कि कीड़े-मकोड़ों पर राज करना आसान है। इंसान कीड़े-मकोड़ों में बदल जाएं तो फिर राज शाश्वत है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)


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